बुधवार, 16 मार्च 2011

बचपन मे









समुन्दर बचपन में बदल था
किताब बचपन में अक्षर
माँ कि गोद जितनी ही थी धरती
बचपन में

हर पकवान बचपन में दूध था
पेड़ बचपन में बिज थे
चुम्मियाँ भर थी प्रार्थनाए बचपन में

सरे रिश्तेदार बचपन में खिलोने थे
हर वाद्य बचपन में झुनझुना
तेरी हँसी कि चेहचहाहट भर
तो थे
सारे श्लोक बचपन में

इश्वर बचपन में माँ था
हर लोकनृत्य बचपन
में
तेरी उछलकूद से ज्यादा कुछ नहीं था
:- हेमंत देवलेकर

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