बुधवार, 16 मार्च 2011

बचपन मे









समुन्दर बचपन में बदल था
किताब बचपन में अक्षर
माँ कि गोद जितनी ही थी धरती
बचपन में

हर पकवान बचपन में दूध था
पेड़ बचपन में बिज थे
चुम्मियाँ भर थी प्रार्थनाए बचपन में

सरे रिश्तेदार बचपन में खिलोने थे
हर वाद्य बचपन में झुनझुना
तेरी हँसी कि चेहचहाहट भर
तो थे
सारे श्लोक बचपन में

इश्वर बचपन में माँ था
हर लोकनृत्य बचपन
में
तेरी उछलकूद से ज्यादा कुछ नहीं था
:- हेमंत देवलेकर

शुक्रवार, 11 मार्च 2011

फुल जंगली नहीं होते

हेमंत देओलेकर वेसे तो एक रंगमंच के कलाकार है लेकिन उनकी मोलिक प्रकृति कवी की है वे बेहद संवेदनशील कवी है। सर्वाधिक कविताए उन्होंने बच्चो (बाल मनोविज्ञान) पर लिखी हैप्रस्तुत हे उनकी एक नविनतम रचना-:
फुल जंगली नहीं होते ।
जंगलो मै खिलने भर से क्या
फुल जंगली हो जाते है ।
फूलो और पौधो के बारे मे हमारी जिज्ञासाए
सवालों मै नहीं बदलती ,
क्या देवताओ को अर्पित होना
और गुलदस्तो मे शरीक होना ही कसोटी है
फुल होने की ?
करेले के फुल पर बेठी तितली को देखो !
उसकी आँखों मै भी वाही चमक है
जो किसी को गुलाब देते वक्त
तुम्हारी आँखों मे होती है ।